पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” के रूप में मान्यता देने तथा अवैतनिक घरेलू देखभाल कार्य का न्यूनतम मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के 2026 के निर्णय ने भारत की केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था की ओर पुनः व्यापक ध्यान आकर्षित किया है।
केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था
- केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था से आशय बच्चों, वृद्धजनों, दिव्यांग व्यक्तियों आदि की देखभाल से संबंधित सभी सवैतनिक एवं अवैतनिक गतिविधियों से है।
- देखभाल कार्य आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में मानव विकास, श्रम उत्पादकता तथा सामाजिक कल्याण प्रणालियों का एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है।
- अंतरराष्ट्रीयश्रम संगठन (ILO) के अनुसार, देखभाल सेवाओं के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने से वर्ष 2030 तक विश्व स्तर पर 475 मिलियन रोजगारों का सृजन किया जा सकता है।
- भारत के संदर्भ में, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2% के बराबर प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश से लगभग 1.1 करोड़ रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं, जिनमें से लगभग 70% रोजगार महिलाओं को प्राप्त होंगे।

भारत की केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था के घटक
- अवैतनिक देखभाल कार्य: इसमें बाल देखभाल, वृद्धजनों की देखभाल, भोजन पकाना, सफाई, घरेलू प्रबंधन तथा बीमार परिवारजनों की देखभाल जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
- ये कार्य परिवार के कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, किन्तु अधिकांशतः अवैतनिक तथा औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं होते।
- सवैतनिक देखभाल कार्य: सवैतनिक देखभाल कार्य में स्वास्थ्यकर्मी, नर्स, चिकित्सक, आशा कार्यकर्ता , आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, घरेलू कामगार, बाल देखभाल प्रदाता, सामाजिक कार्यकर्ता तथा अन्य देखभालकर्ताओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ शामिल हैं।
- ये सेवाएँ भारत के सामाजिक एवं आर्थिक आधारभूत ढाँचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- सामुदायिक देखभाल सेवाएँ: सामुदायिक आधारित देखभाल सेवाओं में स्वयं सहायता समूहों (SHGs), सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तथा विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से कमजोर एवं वंचित वर्गों को प्रदान की जाने वाली सहायता शामिल है।
देखभाल सेवाओं की मांग में वृद्धि के कारण
- जनसांख्यिकीय संक्रमण: भारत में वृद्ध जनसंख्या में वृद्धि होने के कारण दीर्घकालिक वृद्ध देखभाल सेवाओं की आवश्यकता बढ़ रही है।
- शहरीकरण एवं प्रवासन: तीव्रता से बढ़ते शहरीकरण एवं प्रवासन के कारण पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था कमजोर हो रही है।
- परमाणु परिवारों के पास देखभाल संबंधी आवश्यकताओं हेतु अनौपचारिक सहायता तंत्र का अभाव होता है।
- महिलाओं की कार्यबल भागीदारी में वृद्धि: अधिक संख्या में महिलाओं के कार्यबल में शामिल होने से संगठित बाल देखभाल एवं अन्य देखभाल सेवाओं की मांग बढ़ी है।
केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था से संबंधित सरकारी पहलें
- समेकित बाल विकास सेवा (ICDS): वर्ष 1975 में प्रारम्भ की गई यह योजना आंगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से प्रारंभिक बाल देखभाल, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ तथा पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करती है।
- लक्षित लाभार्थी:
- 0–6 वर्ष तक के बच्चे
- गर्भवती महिलाएँ
- स्तनपान कराने वाली माताएँ
- प्रमुख सेवाएँ:
- पूरक पोषण
- टीकाकरण
- स्वास्थ्य जांच
- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा
- लक्षित लाभार्थी:
- पोषण अभियान : यह कार्यक्रम महिलाओं एवं बच्चों में बौनापन, कुपोषण तथा एनीमिया को कम करने पर केंद्रित है।
- यह व्यवहार परिवर्तन, POSHAN ट्रैकर जैसी तकनीकों के उपयोग तथा स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं के अभिसरण को प्रोत्साहित करता है।
- मिशन शक्ति: यह महिलाओं के सशक्तिकरण एवं सुरक्षा हेतु एक समग्र कार्यक्रम है।
- इसके अंतर्गत बाल देखभाल सेवाओं तथा महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को समर्थन देने वाली विभिन्न योजनाएँ सम्मिलित हैं।
- पालना योजना: यह योजना 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए डे-केयर सुविधाएँ उपलब्ध कराती है।
- प्रमुख सुविधाएँ:
- पोषण
- स्वास्थ्य देखभाल
- प्रारंभिक शिक्षण सहायता
- यह योजना माताओं को कार्यबल में भागीदारी हेतु आवश्यक सहयोग प्रदान करती है।
- यह मिशन शक्ति के अंतर्गत केंद्र एवं राज्य सरकारों के साझा वित्तीय सहयोग से संचालित होती है।
- प्रमुख सुविधाएँ:
केयर इकोनॉमी/देखभाल अर्थव्यवस्था सुधारों के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- वित्तीय सीमाएँ : देखभाल अवसंरचना के विस्तार तथा कार्यबल प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सार्वजनिक निवेश एवं दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है।
- देखभाल कार्य के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण: देखभाल कार्य को अब भी सार्वजनिक नीति के विषय के बजाय निजी पारिवारिक दायित्व के रूप में देखा जाता है।
- गहरे पैठे पितृसत्तात्मक मानदंड अवैतनिक देखभाल कार्य की उचित मान्यता में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- कमजोर नियामकीय क्षमता: भारत भर में देखभाल संस्थानों के लिए गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करना तथा उनकी निगरानी करना प्रशासनिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है।
- प्रशिक्षित देखभाल कार्यबल का अभाव: भारत में विशेष रूप से वृद्ध देखभाल, दिव्यांग सहायता तथा प्रारंभिक बाल देखभाल के क्षेत्रों में पेशेवर रूप से प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं की कमी है।
आगे की राह
- देखभाल को आवश्यक सामाजिक अवसंरचना के रूप में मान्यता देना: नीतिनिर्माताओं को देखभाल सेवाओं को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के समान आर्थिक और सामाजिक अवसंरचना के एक अनिवार्य घटक के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
- देखभाल सेवाओं में निवेश में प्रोत्साहन: भारत को बाल देखभाल केन्द्रों, वृद्ध देखभाल संस्थानों, पुनर्वास केन्द्रों तथा सामुदायिक सहायता प्रणालियों में सार्वजनिक निवेश को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना चाहिए।
- देखभाल संबंधी नीतियों को श्रम सुधारों, जेंडर बजटिंग तथा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के साथ समन्वित किया जाना चाहिए।
- डेटा संग्रहण एवं मापन प्रणाली का सुदृढ़ीकरण: भारत को समय-उपयोग सर्वेक्षणों तथा सांख्यिकीय ढाँचों को सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि अवैतनिक देखभाल कार्य के आर्थिक योगदान का अधिक सटीक आकलन किया जा सके।
Source: TH
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